जॉली एलएलबी 2 मूवी रिव्यू


हमारी रेटिंग  4.5 / 5
पाठकों की रेटिंग   5 / 5
 
कलाकारअक्षय कुमार, हुमा कुरैशी, अनु कपूर, सौरभ शुक्ला
निर्देशक सुभाष कपूर
मूवी टाइपComedy
अवधि2 घंटा 19 मिनट

स्‍टोरी

जगदीश्‍वर मिश्रा उर्फ जॉली (अक्षय) कानपुर में रहता है। वकालत करना है। एक मशहूर वकील और काबिल दोस्‍त के साथ प्रैक्‍टिस शुरू होती है। मन में विश्‍वास है। लगन है। लक्ष्‍य है। एक प्रेग्‍नेंट विधवा है हिना सिद्दीकी (सयानी गुप्‍ता)। न्‍याय के नाम पर जॉली उसे धोखा देता है। उसके पति की हत्‍या का केस लेता है। लेकिन जब हिना को सच्‍चाई का पता चलता है तो वो आत्‍महत्‍या कर लेती है।अब वकील जॉली के अंदर भूचाल मचता है। उसे ग्‍लानि होती है। अब कहानी में एक हत्‍या का केस है। एक विधवा की लाश है। वकालत है। अनसुलझे सवाल हैं। जॉली को अब न्‍याय चाहिए।

समीक्षा

पर्दे पर अपना जॉली हंसाता है। वकालत करता है, लेकिन कानूनी की कमियों को जानता है। इसका लाभ उठाता है। घर पर वह भीगी बिल्‍ली की तरह है। बीवी से बहुत प्‍यार करता है, जिसे व्‍ह‍िस्‍की, महंगे कपड़े पसंद हैं। लेकिन यह सब कहानी है। कहानी में कोर्टरूम ड्रामा है। यह बहुत हद तक 2013 में आई इसकी पहली किश्‍त ‘जॉली एलएलबी’ की याद दिलाती है।

राइटर-डायरेक्‍टर सुभाष कपूर ने फिल्‍म के लिए खूब रिसर्च की है। वह भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और कानून के वीरबांकों के बारे में अच्‍छी समझ और पकड़ रखते हैं। इसी थीम पर उनकी पिछली फिल्‍म जहां हिट एंड रन केस पर आधारित थी, वहीं इस बार मामला जम्‍मू-कश्‍मीर के एक आतंकी के गलत पहचान का है।

फिल्‍म का प्‍लॉट आपको बांधे रखता है। खासकर फर्स्‍ट हाफ बहुत तेज असर करता है। आपको दिल खोलकर हंसने का मौका मिलता है। भावुक होने का मौका मिलता है और साथ ही कई दफा सोचने का भी मौका मिलता है। कोर्टरूम के अंदर और बाहर आपको जरूरत के हिसाब से पूरा एक्‍शन मिलता है।

इंटरवल के बाद फिल्‍म कहीं-कहीं थमती नजर आती है। कोर्टरूम में जॉली और उसके विरोधी वकील प्रदीप माथुर (अनु कपूर) के बीच लंबी बहसें हैं। अभ‍िभाषण है। जज साबह त्रिपाठी जी (सौरभ शुक्‍ला) का लखनऊ कोर्टरूम है। हालांकि, ये बहस कई मायनों में शिक्षि‍त भी करती है और मनोरंजन भी करती है।

अक्षय कुमार फिल्‍म में गिरगिट की तरह रंग बदलते हैं। वह यह दिखाते हैं कि एक सड़क से उठकर आया आदमी स्‍मार्ट वकील है। उसने भले ही कानूनी दांवपेच की किताबें कम पढ़ी हों, लेकिन उसने कोर्टरूम और अदालत की गलियों के बीच बहुत कुछ सीखा है। हुमा कुरैशी और अनु कपूर अपने रोल में जमते हैं। सभी एक्‍टर्स ने अच्‍छा काम किया है। लिहाजा, फिल्‍म देखने लायक है। मजा आता है।

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