Review: ग्रैंड वेडिंग रिसेप्‍शन है ‘बद्री की दुल्‍हनिया’


बद्रीनाथ की दुल्‍हनिया

रेटिंग:3.5/5

कास्‍ट:आलिया भट्ट, वरुण धवन, आकांक्षा सिंह, गौहर खान, श्‍वेता बसु प्रसाद

डायरेक्‍टर:शशांक खेतान

समय:2 घंटे 19 मिनट

जॉनर:रोमांस

लैंग्‍वेज:हिंदी

कहानी

ब्रदीनाथ अपना हीरो है। देसी अंदाज वाला। उसे एक ठेठ दुल्‍हन की तलाश है। वैसी जैसी वह सपने में सोचता है और चाहता है। वैदेही में क्‍लास है। वह स्‍वच्‍छंद और स्‍वतंत्र जीवन की चाह रखती है। बिलकुल इंडिपेंडेंट लाइफ। अब दोनों मिलते हैं। अपनी-अपनी चाहत और सपनों के बीच जीवन है। दोनों लाइफ में अपने रोल को पहचानते हैं। समझते हैं। संस्‍कृति और परंपराओं की जद्दोजहद भी है, जिसे सुलझाते हैं।

समीक्षा

बद्रीनाथ की दुल्‍हनिया’ सिर्फ एक प्रेम कहानी नहीं है। इसमें प्‍यार के साथ समाज भी है। सामाजिक मुद्दे हैं, जो धमाकेदार हो सकते हैं। ये प्‍यार से जुड़े हैं। शादी से जुड़े हैं। फिल्‍म इसी सब को एक थैले में समेटते हुए बड़ी सावधानी से आगे बढ़ती है।

फिल्‍म की कहानी झांसी और कोटा जैसे छोटे शहर की है। यहां पितृसत्ता उतनी ही व्‍यवहारिक है, जितनी सूरज की रोशनी। फिल्‍म में हमारा हीरो बद्रीनाथ (वरुण धवन) एक साहूकार का बेटा है। उसे अपने लिए दुल्‍हन की घनघोर तलाश है। एक शादी में उसे वैदेही (आलिया भट्ट) दिखती है। वह उसे पसंद करने लगता है। वैदेही सामाजिक दबाव के आगे झुकने से इनकार कर देती है।वैदेही आज की लड़की है। वह दहेज और समाज के दवाब में अपने अरमानों का गला नहीं घोंटने वाली। वह ऐसी लड़की है जो छोटे शहर की सोच के बीच अपने खुले विचार और अपना एक ढंग रखती है। वह स्‍वाभि‍मानी है। उसके अपने लक्ष्‍य हैं। अपनी महत्‍वाकांक्षा है।वैदेही का कैरेक्‍टर कहानी की रीढ़ की हड्डी है। इसके बिना फिल्‍म की कल्‍पना बेमानी है। वह दमदार है और असली लगती है। उसके पिता को दिल की बीमारी है। लेकिन वो एक बार भी भावुकता के बंधन में बंधकर सपनों की बलि‍ चढ़ने नहीं देगी। वैदेही के बहाने फिल्‍म लिंग भेद से लेकर महिलावाद, महिलाओं की इच्‍छा जैसे तमाम विषयों को छूती है।फिल्‍म में प्रेम कहानी के साथ मुद्दों पर पकड़ भी है। लेकिन गाना-बजाना और स्‍टाइलिश एंगल के चक्‍कर में यह सब अपनी धमक खो देती है। कई जगह कहानी के पात्र ऐसे बोलते हैं, जैसे कोई नौकरशाह घोषणा कर रहा हो। यह सब इसे थोड़ा छोटा बना देते हैंफिल्‍म की कहानी का अंत वही है, जो आम तौर पर ऐसी कहानी से हमारी कल्‍पना होती है। कुल मिलकार करीब ढाई घंटे थिएटर में बैठना और एक ऐसी कहानी को देखना, जिसका अंत आपको पता है, कुछ लोगों को बोझि‍ल कर सकता है। लेकिन हां, फिल्‍म में रोचकता है। अच्‍छे गाने हैं। डायलॉग्‍स भी ऐसे हैं, जो आपको हंसाते हैं। गंभीर चिंतन में ले जाते हैं। रोमांच पैदा करते हैं। यानी कुल मिलाकर बांधे रखते हैं।वरुण और आलिया पर्दे पर बेहतरीन लगते हैं। दोनों को साथ में देखना खूबसूरत अनुभव देता है। बद्रीनाथ के रूप में वरुण बहुत प्‍यारे लगे हैं। वह आपको पहले सीन से अच्‍छे लगने लगते हैं। कई हाई-ड्रामा सीन में उन्‍होंने गजब का काम किया है। आलिया भट्ट के बारे में क्‍या ही कहना। उन्‍होंने बेहतरीन काम किया है। हां, फिल्‍म में उनकी संवाद अदायगी में जुहू और झांसी का ऊथल-पुथल दिखता है।शादी है। आमंत्रण स्‍वीकार कीजिए। भव्‍य समारोह है। खूब सारी मस्‍ती है। अच्‍छा संगीत है। अच्‍छे लोग हैं। पेट भरने के लिए एंटरटेनमेंट के साथ थोड़े विचार भी हैं।

 

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