ट्यूबलाइट मूवी रिव्यू


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कलाकारसलमान खान, सोहेल खान, ओम पुरी, मोहम्मद जीशान, मातिन रे तांगुं, जू जू
निर्देशक कबीर खान
मूवी टाइपDrama
अवधि2 घंटा 16 मिनट
कहानी: फिल्म की कहानी 1962 के भारत- चीन युद्ध के बैकड्रॉप में कुमायूं के एक कस्बे जगतपुर में रहने वाले बच्चे लक्ष्मण सिंह बिष्ट (सलमान खान) की है, जिसे उसके साथी उसकी बेवकूफाना हरकतों के चलते ट्यूबलाइट कहकर पुकारते हैं।

रिव्यू: ट्यूबलाइट फिल्म के शुरुआती सीन में गांधी जी लोगों को को उपदेश देते नजर आते हैं, अगर मुझे यकीन है, तो मैं वह काम भी कर सकता हूं, जो करने की ताकत मुझमें नहीं है। शायद इसी यकीन की बदौलत डायरेक्टर कबीर खान ने भी अमेरिकी फिल्म लिटिल बॉय की हिंदी अडप्टेशन में सलमान खान को साइन कर लिया, लेकिन वह भूल गए कि जिस चीज पर उन्हें यकीन है, जरूरी नहीं कि उस पर दर्शकों को भी यकीन होगा। जहां असल फिल्म लिटिल बॉय में एक बच्चा युद्ध में गए अपने पिता को वापस लाने की कोशिश करता है वहीं यहां सलमान खान युद्ध में गए अपने छोटे भाई सोहेल खान को वापस लाने की कोशिशें करते नजर आते हैं। पहले एक भोंदू बच्चे और फिर एक भोंदू आदमी के रोल में सलमान के फैंस उन्हें हजम नहीं कर पाते।

फिल्म की कहानी 1962 के भारत- चीन युद्ध के बैकड्रॉप में कुमायूं के एक कस्बे जगतपुर में रहने वाले बच्चे लक्ष्मण सिंह बिष्ट (सलमान खान) की है, जिसे उसके साथी उसकी बेवकूफाना हरकतों के चलते ट्यूबलाइट कहकर पुकारते हैं। हालांकि उसका छोटा भाई भरत सिंह बिष्ट (सोहेल खान) अपने भाई को पूरा सपॉर्ट करता है। अपने मां-बाप के मर जाने के बाद लक्ष्मण और भरत जगतपुर में बन्ने चाचा (ओम पुरी) की सरपरस्ती में रह रहे हैं। इसी बीच भारत-चीन में युद्ध छिड़ जाता है और भरत मोर्चे पर चला जाता है। अपने भाई के बिना साइकल की चेन तक भी नहीं चढ़ा पाने वाला लक्ष्मण उसे बेहद मिस करता है और उसे वापस लाने की कोशिशों में जुट जाता है।
इसके लिए लक्ष्मण बन्ने चाचा से गांधी जी की शिक्षाएं सीखता है। इसी बीच उनके कस्बे में चीनी महिला ली लिन (जू जू)और उसका बेटा गूवो (मातिन रे तांगुं) आ जाते हैं। चीन से लड़ाई की वजह से नाराज कस्बे वाले खासकर नारायण तिवारी (मोहम्मद जीशान अय्यूब) उन पर हमला करते हैं, लेकिन लक्ष्मण उनकी मदद करता है। कस्बे में एक जादूगर गोगो पाशा (शाहरुख खान) आता है, जो कि लक्ष्मण को यकीन जगा देता है कि वह चाहे तो कुछ भी कर सकता है। उधर लक्ष्मण को खबर मिलती है कि उसका भाई भरत चीनी फौज की कैद में है। तो क्या लक्ष्मण अपने भाई को वापस लाने में कामयाब हो पाता है?

बात अगर डायरेक्शन की करें, तो कबीर खान की फिल्म पर कतई पकड़ नजर नहीं आती। एक अच्छी कहानी पर बनी फिल्म प्लॉट की गड़बड़ी के चलते दर्शकों को निराश करती है। खुद पर यकीन करने के फंडे के चलते कबीर ने फिल्म में सलमान से तमाम अटपटी चीजें कराई हैं। फिल्म का फर्स्ट हाफ कमजोर है, तो सेकंड हाफ में चीजें और भी खराब हो जाती हैं। कईं सीन तो बेहट अटपटे हैं। मसलन एक सीन में सलमान शर्ट-पैंट-स्वेटर और जूते पहनकर नदी में छलांग लगाते नजर आते हैं वहीं एक दूसरे सीन में सोहेल खान को गोली लग जाती है, तो वह अपने साथी को उसके फटे हुए जूतों की बजाय अपने जूते पहनने को कहता है। उसका साथी सोहेल के जूते पहनता है, इतने में उसे भी गोली लग जाती है, लेकिन जब भारतीय सेना के सिपाही उनके पास पहुंचते हैं, तो वहां उन्हें दोनों के पैरों में जूते नजर आते हैं।

सलमान खान के फैंस उन्हें दबंग अंदाज वाले रोल्स में देखना पसंद करते हैं, लेकिन इस फिल्म में वह एक निरीह आदमी के रोल में नजर आते हैं, जो कि पूरी फिल्म में दूसरों के सामने रोता-गिड़गिड़ाता ही रहता है। सलमान जितनी बार इमोशनल सीन करते हैं, उतनी बार फैंस हंसते नजर आते हैं। खासकर सेना की भर्ती वाले सीन में और पूरी फिल्म के दौरान अपनी जिप बंद करने के दौरान सलमान फैंस का खूब मनोरंजन करते हैं वहीं रोने के सींस में कई बार सलमान ओवर ऐक्टिंग करते नजर आते हैं।

सोहेल खान के पास फिल्म में ज्यादा सीन नहीं हैं, लेकिन कास्टिंग के लिहाज से देखें, तो वह सलमान के छोटे कम और बड़े भाई ज्यादा नजर आते हैं। बन्ने चाचा के रोल में ओम पुरी जमे हैं, तो मोहम्मद जीशान ने भी अच्छा रोल किया है वहीं जू जू और मातिन रे तांगुं फिल्म का सरप्राइज पैकेज हैं। हालांकि शाहरुख खान ने इस फिल्म में बेहद छोटा जादूगर का रोल क्यों साइन किया? इसका जवाब वह खुद ही दे सकते हैं।

फिल्म में लद्दाख की वादियां खूबसूरत लगती हैं इंडो-चाइना वॉर को भी दर्शाने की बेहतर कोशिश की गई है। फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर भी दर्शकों को बांधने वाला है। बात अगर म्यूजिक की करें, तो रेडियो सॉन्ग पहले से ही फैंस के बीच पॉप्युलर हो चुका है, जिसका पिक्चराइजेशन खूबसूरत तरीके से किया गया है। फिल्म के बाकी गाने भी दर्शकों को बांधते हैं। पहले यह फिल्म 2 घंटे 35 मिनट की शूट हुई थी, लेकिन फिर इसे एडिट करते 2 घंटे 16 मिनट कर दिया गया। अगर कबीर चाहते, तो फिल्म पर 15 मिनट की और कैंची चलाकर इसे और टाइट बना सकते थे। बावजूद इसके अगर आप सलमान के जबर्दस्त फैन हैं, तो ईद पर उनसे मिलने सिनेमाघर जा सकते हैं।

मूवी मसाला के सेक्‍शन


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